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समर्पित जीवन

 

समाज में मौजूद अनेक बुराईयों एवं दूसरों की कमियों पर चर्चा करने वाले लोग हर मोड पर मिल जाते हैं। स्वतंत्रता के बाद सात दशक तक भी समाज कुछ वर्गों तथा दूरदराज के क्षेत्रों में यदि विकास की किरण नहीं पहुँच सकी है तो उसके लिए सरकार को लगातार दोषी ठहराने वाले लोग भी हर तरफ दिखायी देते हैं। समाचार पत्रों से लेकर टेलीविजन चैनलों तथा सोशल मीडियों के तमाम मंचों पर भी अक्सर ऐसी चर्चाएं खूब होती हैं। किन्तु समाज में मौजूद किसी बुराई को समाप्त करने का संकल्प लेकर शुरुआत करने वाले, किसी तात्कालिक समस्या के समाधान हेतु अपने स्तर पर प्रयास शुरू करने वाले अथवा सरकार के भरोसे बैठे रहने की बजाए अपना विकास स्वयं करने की मिसाल प्रस्तुत करने वाले लोग बहुत कम दिखायी देते हैं। लेकिन इसके विपरीत यह भी सच है कि समाजजीवन के अनेक क्षेत्रों में आज यदि बेहतर माहौल दिखायी देता है उसमें ऐसे जीवनव्रतियों का बहुत अधिक योगदान है जिन्होंने अपनी अथवा अपने परिवार की खुशियों की परवाह किये बगैर दूसरों के मुरझाये हुए चेहरों पर मुस्कान लौटाने हेतु अपना पूरा जीवन और अपनी तमाम व्यक्तिगत आकांक्षाओं की बलि दे दी। ये ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने न कभी किसी समाचार पत्र में अपनी फोटो छपवाने का प्रयास किया और न ही कभी किसी टेलीविजन पर आकर समाज में आए बदलाव का श्रेय लेने का प्रयास किया। ये ऐसे नींव के पत्थर हैं जिन्हें सकरात्मक बदलाव की वर्तमान तस्वीर में कहीं ढूंढ पाना भी बहुत मुश्किल है। उनके योगदान को सिर्फ वे ही लोग महसूस करते हैं, जो उस बदलाव के साक्षी हैं।

कुष्ठ रोग ऐसी बीमारी है, जिसे लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां व्याप्त हैं। जिस व्यक्ति को यह बीमारी हो जाती है उसका जीवन तो नर्क समान बन ही जाता है साथ ही उसके स्वस्थ परिवारजनों का जीवन भी कष्टमय हो जाता है।  आज यदि देश में अनेक स्थानों पर कुष्ठ रोग को समाप्त करने तथा इस बीमारी से ग्रस्त लोगों के ईलाज तथा स्वस्थ हो चुके लोगों के पुनर्वास का एक अच्छा दृश्य दिखायी देता है तो उसका श्रेय सरकार से अधिक उन लोगों को जाता है जिन्होंने इस बीमारी से ग्रस्त लोगों के अंदर सम्मान से जीवन जीने की लौ जगायी और उन्हें स्वावलंबी जीवन जीने योग्य बनाया। ऐसा ही एक नाम है कात्रे गुरूजी का, जिन्होंने वर्तमान छत्तीसगढ के चांपा में ऐसा ही प्रेरक प्रयोग किया। समाज में ऐसे बहुत से प्रयोग हुए हैं जिनके माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में स्वाभिमानपूर्वक जीने की एक उम्मीद जगी है। कहीं विखंडित समाज में फिर से समरसता स्थापित हुई है तो कहीं रोजगार के अभाव में पलायन को मजबूर दूरदराज एवं सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग अपने ही स्थान पर सम्मानपूर्वक जीवन जी रहे हैं। कहीं बढ़ते वैश्विक तापमान और पर्यावरण असंतुलन के कारण पूरे विश्व के समक्ष उत्पन्न संकट के समाधान हेतु अनुकरणीय प्रयास हुए हैं तो कहीं जैव विविधता के संरक्षण हेतु कुछ लोगों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया है। कहीं युगानुकूल ग्राम विकास के अद्भुत प्रयोग हुए हैं तो कहीं शहरों की सेवा बस्तियों में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में नारकीय जीवन जीने को मजबूर लोग सम्मानपूर्वक जीवन जीने लगे हैं। जो लोग कल तक अपने पैरों पर खडे होने के लिए दूसरों की मदद ले रहे थे, वही आज स्वयं सशक्त होकर अपने ही समाज के दूसरे अभावग्रस्त लोगों को सशक्त बनाने के लिए प्रयासरत हैं।

ऐसे कुछ तपस्वियों का स्मरण करना हो तो मस्तिष्क में सैंकडों नाम उभरते हैं। दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से पांच सौ से अधिक ग्रामों को अपना विकास स्वयं करने के लिए प्रेरित कर पूरी दुनिया के सामने स्वावलंबी ग्राम, विवादमुक्त ग्राम, सम्पूर्ण साक्षर ग्राम, उर्जायुक्त ग्राम, पूर्णतः बाहय शौचमुक्त ग्राम आदि के रूप में एक मिसाल प्रस्तुत करने वाले चित्रकूट शिल्पी नानाजी देशमुख एक ऐसा ही नाम है। कर्नाटक के दूरस्थ क्षेत्रों में सामाजिक बदलाव का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करने वाले हिन्दू सेवा प्रतिष्ठान के हजारों सेवाव्रतियों की प्रेरणा अजित कुमारजी और भूकम्प की विभाषिका के बाद उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल आधुनिक विकास का प्रेरक मॉडल विकसित कर सैंकडों ग्रामों में उसे मूर्त रूप प्रदान करने वाले डा नित्यानंदजी को आखिर कौन भुला सकता है? सेवा भारती के माध्यम से शहरों की सेवा बस्तियों में रहने वाले लाखों अभावग्रस्त लोगों के जीवन में गुणवत्तापूर्ण बदलाव लाने की पहल करने वाले विष्णु कुमारजी और अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से देश के करोडों वनवासियों में स्वाभिमान का भाव जागृत कर अपने जीवन मूल्यों एवं समृद्ध परम्पराओं को संरक्षित करते हुए विकास की मुख्यधारा से जोड़ने वाले रमाकान्त केशव देशपांडे भी ऐसे ही नाम हैं। हमारे आसपास भी ऐसे अनेक नाम हो सकते हैं। ये ऐसे चहरे हैं, जिन्होंने नींव का पत्थर बनकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन के ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, जिनसे सैंकडों नहीं बल्कि हजारों, लाखों लोगों के जीवन को नई दिशा मिली है। ऐसे तपस्वी समाज जीवन के हर क्षेत्र में दिखायी देते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तो ऐसे समर्पित जीवनव्रतियों की बहुत लंबी श्रंखला है जिन्होंने संघ संस्थापक डा हेडगेवार के प्रसिद्धिपरांगमुखता के सूत्र का पालन करते हुए समाज में परिवर्तन की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की है। इस स्तंभ के तहत कुछ ऐसे ही समर्पित जीवन से आपका परिचय कराने का प्रयास है।